Friday, July 16, 2010

एक नई मंजिल की ओर !

एक मन था
जो बेचैन हुआ था
क्यों था
ये पता नहीं था
कब तक रहती
पीड़ा मन में
और कब तक रहता
संशय मन में
कब तक मैं समझाता मन को
और कब तक
मन समझाता मुझको

कब तक रहता सन्नाटा
और कब तक रहती खामोशी
मौन टूट पडा था मेरा
हां कहकर
फिर मौन हुआ था
तब तक मन तो
झूम उठा था
एक नई सुबह
नई भोर हुई थी
नई राह पर चल पडा था
मन आगे
और पीछे मैं था
एक नई मंजिल की ओर !

6 comments:

ललित शर्मा said...

वाह,विस्वास के साथ आगे बढते हुए कदम अच्छे लगे। निराशा का दामन छोड़ कर आशा के साथ बढते हुए नई मंजिल को पाने की आकांक्षा सराहनीय है।

बस मन स्थिर हो जाए, तो मंजिल दूर नहीं।

बहुत अच्छी कविता
आभार

माधव said...

बहुत अच्छी कविता

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कविता
धन्यवाद

Udan Tashtari said...

बढ़िया है..इसी सकारात्मकता के साथ बढ़े चलिए.

Anonymous said...

बहुत बढिया!

Divya said...

sundar prastuti !

aabhar !