Thursday, July 8, 2010

................. बस इतनी ही गर्म-जोशी है !!!

क्या तेरे भीतर
बस इतनी ही गर्म-जोशी है
जो मुझे देखते - देखते
तू हो जाता है स्खलित

क्या अब भी तुझे
है घमंड
मर्द होने का
या कुछ बचा है
डींगें हांकने को

ये तेरा दोष नहीं
मेरा जिश्मानी हुनर है
जो तुझे कर देता है
पल पल में व्याकुल

हां मुझे खबर है
मेरे जिस्म के अंग
हैं कितने मादक
जिसे देखने को
तू रहता है कितना आतुर

पर क्यों
क्या तेरी जिज्ञासा
बस इतनी ही है
जो पल भर में
कर देती है
तुझको
स्खलित

जरा सोच जब तू देखेगा
मुझको
सिर से पैरों तक
निर्वस्त्र ..... तब तेरी आंखें
क्या रह पायेंगी स्थिर
या फ़िर तू मुझे देखते देखते
हो जायेगा फ़िर से स्खलित

क्या यहीं तक है तेरी मर्दांगी
या फ़िर अब भी बचा है कुछ
डींगें हांकने को, दम भरने को
चुप क्यों है, कुछ कह दे
नहीं तो मर्दांगी तुझे धिक्कारेगी

मत हो व्याकुल, तब भी मैं
तुझे उद्धेलित कर
सवार
कर लूंगी खुद पर
और तुझे पार लगा दूंगी
खुद स्खलित होकर !

मैं नारी हूं
क्या भूल गया तू
तुझे गर्भ में रखकर
एक नारी ने ही पाला-पोसा है
फ़िर कैसे तू खुद को ... !!!

( विशेष नोट :- इस रचना में एक नारी के मनोभावों को पढने का प्रयास किया गया है !)
.........................................................................
धर्म - अधर्म

22 comments:

arvind said...

क्या तेरे भीतर
बस इतनी ही गर्म-जोशी है
जो मुझे देखते - देखते
तू हो जाता है स्खलित
......naari ke manobhaav kaa safal chitran. bahut sundar kavitaa.

महेन्द्र मिश्र said...

नारियों के मनोभावों को इंगित करती हुई...सुन्दर अभिव्यक्ति...

ब्लाग बाबू said...

अंकल आप क्या लिखते हो ३-४ बार पढने के बाद पूरा समझ आता है।

ब्लाग बाबू said...

अंकल आप क्या लिखते हो ३-४ बार पढने के बाद पूरा समझ आता है।

ब्लाग बाबू said...

अंकल आप क्या लिखते हो ३-४ बार पढने के बाद पूरा समझ आता है।

ब्लाग बाबू said...

अंकल आप क्या लिखते हो ३-४ बार पढने के बाद पूरा समझ आता है।

ब्लाग बाबू said...

अंकल आप क्या लिखते हो ३-४ बार पढने के बाद पूरा समझ आता है।

kshama said...

Bahut sahi kaha aapne! 'Aurat ne janam diya mardon ko...."

ललित शर्मा said...

:)

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Zindagee ke sach ka sateek chitran.
---------
चिर यौवन की अभिलाषा..
क्यों बढ रहा है यौन शोषण?

सूर्यकान्त गुप्ता said...

सृष्टि की रचना क्या नारी के शोषण के लिये हुई थी? यही विडंबना है। अच्ची प्रस्तुति।

M VERMA said...

बहुत सुन्दर रचना

ali said...

@श्याम उदय जी
अच्छी कविता पर स्खलन पर कुछ ज्यादा ही जोर है :)

Arvind Mishra said...

रचनाकार अवश्य शीघ्र पतन का पुराना रोगी है-उसे किसी सफ्फाखाना जाना चाहिए ...बिचारा थाम ही नहीं पा रहा !

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

:) :) :)

बढि़या लिखा है भाई ..

क्या भूल गया तू
तुझे गर्भ में रखकर
एक नारी ने ही पाला-पोसा है

राजकुमार सोनी said...

आपकी यह पोस्ट कई तरह के सवाल खड़े करती है
खतरनाक सवाल
और खतरनाक सवाल
लोगों को यह पोस्ट बुरी भी लग सकती है और शायद अच्छी भी
तुलसी इस संसार में भांति-भांति के लोग..

श्याम कोरी 'उदय' said...

@Arvind Mishra
.... रचनाकार को शीघ्रपतन की कोई समस्या नहीं है लेकिन आपके टिप्पणी में दर्ज विचारों से ऎसा प्रतीत हो रहा है कि आप रोगी भी रहे हैं और सफ़्फ़ाखाना भी होकर आए हैं... लगता है आपकी समस्या का समाधान हो गया होगा...!!!

Arvind Mishra said...

@रचनाकार के इस जवाब से दिल को ठंडक मिल गयी .....नहीं तो बिचारे के बारे में कैसे कैसे विचार मन में उमड़ने लगे थे ,,
हाँ भाई रही है न समस्या तभी तो दूसरे के दर्द पहचान गया ..जाकर पैर न फटी बेवाई ते का जाने दर्द परायी ..चलिए अब अपने जी हल्का कर दिया ..शुक्रिया !

श्याम कोरी 'उदय' said...

@ali
... यह सच है कि कविता में स्खलित शब्द पर ज्यादा जोर दिया गया है यहां पर स्खलित शब्द से अश्लीलता नहीं झलकती है वरन भाव झलकते हैं ...!!!!

श्याम कोरी 'उदय' said...

@Arvind Mishra
.... वैसे मैंने एक खुबसूरत महिला से उसकी जुबानी जीवन की सच्चाई सुनी है वह महिला बीच में कुछ समय वैश्याव्रत्ति भी कर चुकी है ... मैं उसकी जीवनी पर एक पुस्तक लिख रहा हूं ... उससे चर्चा उपरांत मिली जानकारी के आधार पर तथा उसके मनोभावों को पढने के आधार पर यह रचना लिखी गई है ... कुछ सत्य-असत्य हो सकता है ...!!!

श्याम कोरी 'उदय' said...

... यहां पर स्खलन का भाव शीघ्रपतन से नहीं है वरन महिला की पूर्ण संतुष्टि से पहले ही पुरुष की संतुष्टि से है ...!!!

luvpandey said...

Dear Uday!

Shwa ki janini! Sristi ki janni! Ek Stri ki sirf yahi paribhasha nahi! Sirf yahi uski abhilasha nahi! jeevan mila sabko ek sa! fir bhi Kya wo hai sirf ek kam-bindu! Hai uski antar-vyatha yahi!

Nice Job! Good Keep it up! but don't follow the media's rules to show off the wrong with the way of wrong! Try to follow god rules, who shows us the bad in good world and good in bad world!

Sahitya asimit hai! Shabdkosh aparmit hai! khoz hi jeevan ka sar hai! doobne walo ko doobne do! lakin kosis doobto ko bachane ki karo!

With warm regards,
Ramakant Pandey