Monday, July 20, 2009

शेर - 91

शेर - 91
कैसे बना दूँ गैर तुझे, एक शुक्रिया अदा कर
तेरा ही शुक्रिया है, हमें जीना सिखा दिया।
शेर - 90
तेरे हम-कदमों से, मंजिलें आसां हैं
तेरे साथ होने से, जिंदगी खुशनुमा है।
शेर - 89
‘उदय’ तेरी ही दोस्ती है, जो हमें जिंदा रखे है
मरने को, तो हम, कब के मर चुके हैं ।
शेर - 88
वक्त ने न जाने क्यूं, बदल दिया हमको
वरना हम थे ऎसे, कि खुद के भी न थे ।
शेर - 87
‘उदय’ कहता है मत पूछो, क्या आलम है बस्ती का
हर किसी का अपना जहां, अपना-अपना आसमां है।

17 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

प्रिय साथीगण
मेरी पिछली पोस्ट पर आदरणीय साथीगण राज भाटिया, नजर, मुरारी पारीक, वन्दना, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी, अर्श, अनिल, वृजमोहन श्रीवास्तव, दिगम्बर नासवा, गुंजन, मार्क राय, निर्मला कपिला जी द्वारा उत्साहवर्धन हेतु महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ दर्ज की गईं, मै इन सभी आदरणीय साथियों का आभारी हूँ तथा आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उत्साहवर्धन जारी रहेगा।
धन्यवाद
श्याम कोरी 'उदय'

Murari Pareek said...

वक्त ने न जाने क्यूं, बदल दिया हमको
वरना हम थे ऎसे, कि खुद के भी न थे ।
waah jo khud ka bhi na tha wo kisi aur ka hona badi gahraiyaan hai aapke shero me !

awaz do humko said...

तेरे हम-कदमों से, मंजिलें आसां हैं
तेरे साथ होने से, जिंदगी खुशनुमा है।

behtareen

MUFLIS said...

उदय जी ! आपके इतने सारे और बड़े प्यारे शेर
पढ़ कर दिल को सुकून हासिल हुआ .....
और इस बार का ये शेर तो बहुत असरदार है
‘"उदय’ कहता है मत पूछो, क्या आलम है बस्ती का
हर किसी का अपना जहां, अपना-अपना आसमां है।"
बधाई स्वीकारें
---मुफलिस---

संजीव गौतम said...

तेरे हम-कदमों से, मंजिलें आसां हैं
तेरे साथ होने से, जिंदगी खुशनुमा है।
nice ahasaasaat se bharapoor

अल्पना वर्मा said...

‘उदय’ कहता है मत पूछो, क्या आलम है बस्ती का
हर किसी का अपना जहां, अपना-अपना आसमां है।

bahut ahccha sher hai.
vastvikta ke kareeb!

रश्मि प्रभा... said...

वाह......

vandana said...

har sher lajawaab hai.

Shama said...

Waah !

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दिगम्बर नासवा said...

वक्त ने न जाने क्यूं, बदल दिया हमको
वरना हम थे ऎसे, कि खुद के भी न थे

Lajawaab sher........sab ke sab khoobsoort hain

‘नज़र’ said...

बहुत ही ख़ूबसूरत अशआर
--------------
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vikram7 said...

वक्त ने न जाने क्यूं, बदल दिया हमको
वरना हम थे ऎसे, कि खुद के भी न थे
अति सुन्दर

महावीर said...

‘उदय’ कहता है मत पूछो, क्या आलम है बस्ती का
हर किसी का अपना जहां, अपना-अपना आसमां है।
बहुत खूबसूरत शेर है.

Mumukshh Ki Rachanain said...

वक्त ने न जाने क्यूं, बदल दिया हमको
वरना हम थे ऎसे, कि खुद के भी न थे ।

अपनी पाठशाला के स्वार्थी पाठ को वक्त की पाठशाला बखूबी बदल देती है पर तब तक समाज पर बहुत अत्याचार हो चुका होता है.
सुन्दर भाव, सुन्दर प्रस्तुति.
बधाई.

शोभना चौरे said...

umda sher
avhi abhivykti.

G M Rajesh said...

bade sher bhare hai ji aapki post par
kaash itne jungle me bhi hon

BrijmohanShrivastava said...

बिलकुल सही यही आलम है सबके अपने अपने जहाँ है और अपने अपने आसमान हैं