Monday, June 29, 2009

शेर - 78

शेर - 78
कहां अपनी, कहां गैरों की बस्ती है
जहां देखो, वहीं पे बम धमाके हैं।
शेर - 77
लिखते-लिखते क्या लिखा, क्या से क्या मैं हो गया
पहले जमीं , फिर आसमाँ, अब सारे जहां का हो गया।
शेर - 76
सजा-ए-मौत दे दे, या दे दे जिंदगी
चाहे अब न ही कह दे, मगर कुछ कह तो दे।

12 comments:

Murari Pareek said...

बहुत ही अछे शेर हैं!! सीधे जख्मी करते हैं!! असल में ये बब्बर शेर हैं !!

‘नज़र’ said...

बहुत बढ़िया!

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब जनाब बहुत अच्छे.
धन्यवाद

दिगम्बर नासवा said...

कहां अपनी, कहां गैरों की बस्ती है
जहां देखो, वहीं पे बम धमाके हैं

lajawaab sher kaha hai uday ji ....

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

आशार के बीच यह नम्बरिंग निगाह पकड़ के पढ़ने का प्रवाह रोकती है| नम्बरिंग ऊपर जहाँ शेर -78 लिखा है वहां पर '' शेर - 76-78 '' के तरीके से लिखा जा सकता है ;वैसे जैसे आप की इच्छा |
शेर गहरे लगे ,अच्छे लगे {इस लिए राय दी थी }

न तो मैं कोई गैर था,
न तो मैं कोई अपना था,
लुटा क्यूँ कर मेरा काफिला,
तेरे इसी मोड़ पे आकर ||

sandhyagupta said...

Pahle dono sher khas taur par achche lage.

KK Yadav said...

Ap to bahut khubsurati se likhte hain...sundar abhivyaktiyan.
"शब्द सृजन की ओर" के लिए के. के. यादव !!

mark rai said...

कहां अपनी, कहां गैरों की बस्ती है
जहां देखो, वहीं पे बम धमाके हैं.....
aaj ki paida ko aapne is sher ke maadhyam se bakhubi ubhara hai..thanks

श्रद्धा जैन said...

Wah aap to kamaal ke sher kahte hain

Likhte likhe kya likha ....... kamaal kaha hai

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत उम्दा शेर...बहुत बहुत बधाई....

Harkirat Haqeer said...

सजा-ए-मौत दे दे, या दे दे जिंदगी
चाहे अब न ही कह दे, मगर कुछ कह तो दे।

वाह जी....बड़ी जालिम है....!!!

अल्पना वर्मा said...

कहां अपनी, कहां गैरों की बस्ती है
जहां देखो, वहीं पे बम धमाके हैं।

bahut sahi kahaa!
umda sher hai!