Wednesday, June 3, 2009

शेर

शेर - 65
‘मसीहे’ की तलाश में दर-दर भटकते फिरे
‘मसीहा’ जब मिला, तो अपने अन्दर ही मिला।

शेर - 64
हो शाम ऎसी कि तन्हाई न हो
मिले जब मोहब्बत तो रुसवाई न हो।

शेर - 63
प्यार हो, तो दूरियाँ अच्छी नहीं
दुश्मनी हो, तो फिर दोस्ती अच्छी नहीं।
शेर - 62
सत्य के पथ पर, अब कोई राही नहीं है
गाँधी के वतन में, अब कोई गाँधी नहीं है ।
शेर - 61
मेरी महफिल में तुम आये, आदाब करता हूँ
कटे ये शाम जन्नत सी, यही फरियाद करता हूँ ।

8 comments:

ओम आर्य said...

बहुत खुब्सूरत रचना है.........

राज भाटिय़ा said...

वाह क्या बात है , बहुत सुंदर लिखा आप ने .

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!!

ARVI'nd said...

phir kuchh behtarin sher padhne ko mila

jamos jhalla said...

jannat ke liye
bhatke
jeevan bhar
jannatnasheen
hokar bhee jannat
naseeb nahin

sandhyagupta said...

‘मसीहे’ की तलाश में दर-दर भटकते फिरे
‘मसीहा’ जब मिला, तो अपने अन्दर ही मिला।

Bahut khub.

दिगम्बर नासवा said...

‘मसीहे’ की तलाश में दर-दर भटकते फिरे
‘मसीहा’ जब मिला, तो अपने अन्दर ही मिला।
वाह.......दिल में झाँक कर तो देख..............

Babli said...

बहुत ख़ूबसूरत रचना है!