Saturday, March 21, 2009

शेर - 24

मिटटी के खिलौने हैं हम सब, मिटटी में ही रचते-बसते हैं
जिस दिन टूट-के बिखरेंगे, मिटटी में ही मिल जायेंगे ।

3 comments:

विनय said...

बिल्कुल सच बात है लेकिन मृत्यु से पूर्व बहुत कम लोग यह बात समझ पाते हैं!

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चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें

अल्पना वर्मा said...

satya kathan hai.

mark rai said...

is kathan me hi to saara jahan hai ...